अंबिकापुर। पिछले 15 दिनों से सरगुजा जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में एकजुटता के लिए जिंदाबाद के नारे संगठित रूप से सुनने को मिल रहे हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां ड्रेज भी गांव में पदयात्रियों के साथ पहुंच रहे हंै। सभाएं हो रही हैं, लगभग 100 गांवों में नवगठित छत्तीसगढ़ किसान मजदूर संगठन के साथी ग्रामीणों, मजदूरों के मूलभूत मुद्दे मजबूती से उठा रहे हंै। नवगठित संगठन में 31 मई तक 2094 लोगों ने सदस्यता ली है। लखनपुर, बतौली, लुंड्रा और उदयपुर विकासखंड के लोग भारी मात्रा में संगठन के उद्देश्यों को सार्थक करने के लिए जुड़े हैं। इनका उद्देश्य असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत मजदूरों को संगठित करना, सदस्यों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना, बेहतर मजदूरी एवं काम के शर्तों के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना, दुर्घटना की दशा में मजदूरों को कर्मकार अधिनियमों के अधीन अनुग्रह राशि दिलवाने का प्रयत्न करना, बीमारी, बुढ़ापा, बेकारी, दुर्घटना और मृत्यु की दशा में सदस्यों और उनके आश्रितों के लिए सहायता के लिए प्रयत्न करना, समान उद्देश्यों वाले कामगारों के अन्य संगठनों के साथ सहयोग करना और उनके साथ संबंध मजबूत करना है। हर बैठकों में लोगों ने अपने सामूहिक और व्यक्तिगत समस्याओं को उठाया है।
लखनपुर के बिनिया पंचायत में हुई बैठक में लोग वर्ष 2018 के लेमरू प्रोजेक्ट को रोकने की सफलता को ध्यान में रखते हुए संगठन को बनाने एकजुट हुए। दिल्वंद राम (60) ने संगठन निर्माण के महत्व के बारे में बताया। लोगों का मानना था कि संगठन में सिर्फ पैसा देना ही काफी नहीं है, सक्रिय होना भी बहुत जरूरी है। यात्रा के दौरान ग्रामीणों ने संगठन के साथियों को मु_ी चावल सहित अन्य राशन सामग्री स्वेच्छा से देकर संघर्ष की परंपरा को जीवंत किया। हर बैठक में राशन, पोषण, पेंशन, रोजगार गारंटी, वन अधिकार, स्वास्थ्य, पेयजल, और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जमीनी हकीकत उभरकर सामने आई। उदयपुर के भेलवादांध गांव के लोगों ने बताया उन्हें राशन के लिए 20 किलोमीटर पहाड़ चढऩा पड़ता है। इसके लिए लिखित आवेदन संगठन को दिया गया है। बीपीएल सूची में नाम नहीं होने के कारण पेंशन से वंचित रखने जैसे मामले भी सामने आ रहे हैं। पहाड़ी कोरवा के नाम पर जाति प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने की बात भी सामने आई है।
सोयाबड़ी की जगह दें हरी सब्जी व अंडा-
लुंड्रा गांव के छेरमुंडा गांव में महिलाओं के साथ पोषण पर चर्चा करने के दौरान आंगनबाड़ी और स्कूलों में ज्यादातर सोया बड़ी दिया जाता है। उनका मानना है कि उसके बदले हरी सब्जियों का वितरण होना चाहिए। उन्होंने बताया कि आदिवासी अंडा खाते हैं, जिसे कुछ दिन देने के बाद सरकार ने देकर बंद कर दिया, इसे नियमित करने की जरुरत है।
वन अधिकार का मुद्दा रहा अहम-
वन अधिकार का मुद्दा लोगों के लिए अहम था, जहां सात एकड़ का कब्जा है वहां 10 डिसमिल का पट्टा दिया गया है। सालों पहले आवेदन देने के बाद हाथ में अभी तक पट्टा नहीं आने की जानकारी सामने आई। जिनकी उपजीविका मुख्य तौर पर वन आधारित है, उनको अभी तक अपने जमीन की कुछ सूचना नहीं मिली है। बतौली के गोविंदपुर गांव के पहाड़ी कोरवा समुदाय ने बताया कि उनके कब्जे की जमीन को दबंगोंं ने गलत तरीके से पट्टा बनवाकर छीन लिया है। कोडकेल के लोगों ने मुद्दा उठाया कि गांव के 35 पात्र लोगों को सालों से पट्टा नहीं मिला है।
पखवाड़े भर से गांवों में संगठित हो ग्रामीण लगा रहे जिंदाबाद के नारे बैठकों में सामूहिक और व्यक्तिगत समस्याएं सामने ला रहे ग्रामीण

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