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छत्तीसगढ़

घर की दहलीज से सीढ़ी व छत तक हरितिमा से आच्छादित पर्यावरण को स्वच्छ व सुरक्षित रखना हम सबकी जिम्मेदारी, केंद्रीय जेल की कल्याण अधिकारी बानी मुखर्जी दे रही संदेश


अंबिकापुर। पर्यावरण में पिछले कुछ वर्षों से कई तरह के असामान्य और अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं, इसका प्रभाव प्रकृति के प्रमुख घटकों जल, जंगल, जमीन और वायुमंडल पर पड़ रहा है। दुष्प्रभाव इतना तीव्र है कि पृथ्वी, वायुमंडल और संपूर्ण जीव जगत के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। मानव व्यवहार से लगातार नष्ट हो रही जैविक विविधता एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है। इन हालातों के बीच पर्यावरण सुरक्षा की ड्रामेबाजी भी जोरों पर चल रही है। वर्षों पुराने जंगल क्षेत्र की बलि खनिज उत्खनन, उद्योग के नाम पर करने का असर मानव जन-जीवन पर पड़ रहा है। इन सबके बीच केंद्रीय जेल की कल्याण अधिकारी बानी मुखर्जी पर्यावरणीय सुरक्षा व जैव विविधता के मामले में शहर वासियों के लिए मिसाल हैं। उनका पूरा घर हरीतिमा से आच्छादित देखने को मिलता है। घर की सीढ़ी से दीवार और छत तक तमाम पेड़-पौधों से भरे पड़े हैं। हर अनुपयोगी वस्तु को उपयोगी बनाने की कोशिश उन्होंने की है। सब्जी से लेकर फल, फूल, ऑक्सीजन देने व कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने वाले वृक्ष यहां देखने को मिलते हैं। इस रास्ते से गुजरने वाले लोगों की निगाह इनके घर की दीवारों, सीढ़ी की रेलिंग में विभिन्न अनुपयोगी पात्रों को आकर्षक रूप देकर लगाए गए पौधों को देखकर बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। शासकीय सेवा में रहने के बाद भी बानी मुखर्जी का पर्यावरण की सुरक्षा के लिए किया गया प्रयास न सिर्फ अनुकरणीय बल्कि प्रेरणादायक है। गार्डन की शक्ल लिया दो मंजिला घर और छत तमाम ऐसे पौधों से आच्छादित है, जिनकी कल्पना हम नहीं कर सकते हैं।
जैव विविधता की हानि बड़े खतरों में शुमार-
बानी मुखर्जी का कहना है कि हाल ही में विश्व आर्थिक मंच (डब्लूईएफ) ने अपनी ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में जैव विविधता की हानि को मानव सभ्यता के सामने मौजूद सबसे बड़े खतरों में शुमार किया है। प्रदूषण रोकने के कुप्रबंधन और वनों की अनियंत्रित कटाई से भी पर्यावरण का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। इसके दुष्परिणाम ग्लोबल वार्मिंग, चक्रवात, बाढ़ के रूप में देखने को मिल रहे हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक एवं पर्यावरणविद् लगातार बिगड़ते पर्यावरण के बारे में पूरी दुनिया को आगाह कराने में लगे हैं।
पर्यावरण के घटकों को पहुंच रहा नुकसान-
लगातार बिगड़ते पर्यावरण के मूल कारणों को अगर हम तलाशें तो पाएंगे कि विकास व तकनीकि प्रगति की अंधी दौड़ में हमने पर्यावरण के घटकों को स्थाई रूप से नुकसान पहुंचाया है। उपभोक्तावाद के बढ़ते प्रभाव व उपभोग की अनियंत्रित आदतों के कारण संसाधनों के असीमित दोहन की प्रवृत्ति इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेदार है। यह दोहन इस स्तर तक बढ़ गया है कि पर्यावरण के घटकों में असंतुलन बढ़ता ही जा रहा है। दरअसल पर्यावरण जिस तरह पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवधारियों को प्रभावित करता है उसी तरह वह स्वयं भी सारे जीवधारियों की गतिविधियों से प्रभावित होता है। यानि पर्यावरण और समस्त जीवधारियों में गहरा संबंध होता है। यह पूरी तरह आपसी संतुलन पर टिका है। जब मानवीय गतिविधियां अनियंत्रित और प्रकृति के विरूद्ध होती है तो यह संतुलन बिगड़ता है और पर्यावरण कई संकटों से ग्रस्त होने लगते है।
गमले में 22 वर्ष का बरगद का पेड़-
बच्चे के जन्मदिन पर बानी मुखर्जी ने बरगद के पौधे को एक गमले में लगाया था। यह पौधा 22 वर्ष का हो चुका है, लेकिन इसकी कद-काठी आज तक विशाल रूप नहीं ले पाई है। ऐसे तमाम पौधे जो बड़े वृक्ष का रूप ले सकते हैं, इसे बानी मुखर्जी ने अपनी देखभाल व नियमित कटाई-छंटाई की बदौलत ऐसा रूप दिया है, जो आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। बानी मुखर्जी के घर की बाउंड्री से लेकर सीढ़ी और छत तक दिखती हरितिमा को देखने के लिए बॉटनिकल के छात्र ही नहीं, उत्सुकतावश कई बार आम लोग भी पहुंच जाते हैं।
सभी को करना होगा प्रयास-
केंद्रीय जेल की कल्याण अधिकारी बानी मुखर्जी का कहना है कि पृथ्वी को बचाने के क्रम में पर्यावरण के प्रति चिंता जताने के लिए अब तक हजारों सेमीनार और सम्मेलन होते रहे हैं, यह सिलसिला अब भी जारी है लेकिन पर्यावरणीय स्थिति दिनोंदिन बिगड़ते ही जा रही है। ऐसे में अब वक्त आ गया है कि हम सभी अपनी जिम्मेदारी समझें। सिर्फ विचार या सम्मेलन ही नहीं धरती और पर्यावरण को बचाने के संकल्प के साथ इस दिशा में प्रयास शुरू करें क्योंकि इसकी रक्षा का दायित्व हम सभी इंसानों पर समान रूप से है। प्रदूषण रोकने के हरसंभव प्रयास करने होंगे। प्रकृति के विनाश को रोकना होगा। पेड़, नदी, तालाब, भूमि, जंगल और जंतु प्रजातियों को बचाना होगा। अपनी उपभोग की आदतों पर लगाम लगाकर हमें पर्यावरण संतुलन को दिशा में कुछ ठोस उपाय करने होंगे। प्रकृति हजारों साल से हमें कुछ न कुछ देती आ रही है और हम सदा ही लेते आए हैं। हम सबको इसके संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लेना होगा।

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