अंबिकापुर। सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले पूर्व सांसद सोहन पोटाई ने परसा पहुंच आंदोलनकारियों के समर्थन में हसदेव अरण्य के जल-जंगल-जमीन को बचाने हुंकार भरी। इस विरोध प्रदर्शन में महिलाएं भी काफी संख्या में सामने आई। इन्होंने कोयला उत्खनन के विरोध में एनएच 130 पर चक्काजाम किया है, वहीं परसा ईस्ट, केते खदान से कोयला ले जाने वाले रेल्वे ट्रेक को भी बाधित कर दिया। रेलवे पटरी पर बैठकर राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और केंद्र व राज्य सरकार के खिलाफ इन्होंने आक्रोश जाहिर किया। आंदोलन में छत्तीसगढ़ प्रदेश के साथ-साथ अन्य प्रदेश के लोग भी आदिवासी ग्रामीणों के साथ शामिल हुए। ग्रामीणों की एकजुटता और काफी संख्या में इनकी मौजूदगी को देखते हुए प्रशासन ने एनएच से गुजरने वाले वाहनों का मार्ग बदल दिया था, वहीं काफी संख्या में पुलिस बल भी तैनात किए गए थे। हजारों की संख्या में प्रदेश भर से पहुंचे आदिवासी व ग्रामीण सड़क पर डटे हुए थे। आदिवासी नेताओं ने चेतावनी दी कि कोयला उत्खनन नहीं रोका गया तो प्रदेश भर में आदिवासी सड़कों पर उतरेंगे।
परसा में कोल उत्खनन की खिलाफत लंबे समय से हो रही है। हसदेव अरण्य को बचाने के लिए चल रहे आंदोलन को पूर्व में राहुल गांधी भी समर्थन दे चुके हैं। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं थी, उस दौर में राहुल गांधी ने आश्वस्त किया था कि यदि कांग्रेस की सरकार बनी तो आपको जंगल, जमीन से नहीं हटाया जाएगा। वहीं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के भूपेश बघेल के नेतृत्व में चल रही सरकार के द्वारा परसा कोल ब्लॉक उत्खनन और परसा ईस्ट बासेन में कोयला खनन के एक्सटेंशन को अनुमति दे दी। ऐसे में हसदेव अरण्य को लेकर आंदोलन व्यापक होने लगा है। हसदेव बचाओ अभियान के समर्थन को ना केवल देश बल्कि विदेशों से भी समर्थन मिल रहा है। हसदेव अरण्य आंदोलनकारी और पर्यावरण के लिए संघर्षरत लोगों का कहना है कि प्रदेश के 180 कोल ब्लॉक में कोयला भंडारण 58 हजार मिलियन टन है, इनमें से 130 कोल ब्लॉक जंगलों से बाहर हैं। जिस हसदेव अरण्य में खनन को लेकर विरोध में आदिवासी वहीं दूसरी तरफ सरकार है वहां केवल पांच हजार टन कोयले का भंडार है। सवाल उठ रहा है कि हाथियों के रहवास और मध्य भारत के फेफड़े के रूप में पहचाने जाने वाले हसदेव के घने जंगल, जिसे भारतीय वन्य जीव संस्थान ने जैव विविधता से परिपूर्ण वन क्षेत्र माना है।
मुख्यमंत्री को लिखी यह बात-
सर्व आदिवासी समाज ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को संबोधित पत्र में लिखा है कि खनन प्रस्ताव अनुमति में बहुत सारी वैधानिक कमियां व खामियां हैं। पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में आने वाले सरगुजा में किसी भी काम के लिए ग्राम सभा की अनुमति जरूरी है लेकिन किसी भी ग्राम सभा से अनुमति नहीं ली गई है बल्कि फर्जी ग्राम सभा की कवायद प्रशासन की है। सर्व आदिवासी समाज की ओर से कहा गया है कि जो आदिवासी के पूर्वज हैं वे उस भूमि के विशिष्ट स्थानों पर निवास करते हैं। इन्हें किसी दूसरी भूमि मेंं स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है। विस्थापन का मतलब आदिवासियों के दृढ़ प्राकृतिक आस्था प्रणाली का विनाश होगा। पत्र में चेतावनी दी गई है कि परसा कोल ब्लॉक उत्खनन की अनुमति को निरस्त कर परसा ईस्ट बासेन में कोयला खनन को तत्काल बंद नहीं किया गया तो पूरे प्रदेश में सर्व आदिवासी समाज उग्र आंदोलन करेगा।
कोल ब्लॉक के लिए पेड़ काटना चिंताजनक-वीरेंद्र पांडेय
हरिहरपुर, फतेहपुर और साल्ही कोल ब्लॉक के लिए लगभग ढाई से तीन लाख पेड़ कटेंगे। ये पूरे छत्तीसगढ़ के लिए खराब स्थिति है। पेड़ नहीं हम सबकी हत्या के लिए दस्तावेज पर दस्तखत कर दिए गए हंै। उक्त बातें शुक्रवार को सर्किट हाउस अंबिकापुर में पत्रकारों से चर्चा करते हुए वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पांडे ने कहीं। उन्होंने कहा कि हसदेव कोल परियोजना के लिए 11 करोड़ 40 लाख टन कोयला खनन के लिए 15 सालों की अनुमति मिली थी, पर 10 साल में ही पूरा खनन कर लिया गया और 82 लाख टन कोयला निकाला गया। 98 लाख टन कोयला का पता नहीं चला, यह जहां जाना था वहां न जाकर कहीं और चला गया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री कहते हैं कि लोगों को जंगल चाहिए कि बिजली। वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र पांडे ने कहा कि हमें बिजली और जंगल दोनों चाहिए। तय करना पड़े तो हमें जंगल की ज्यादा आवश्यकता है। अगर लालच छोड़ दिया जाए तो लोगों को जंगल और बिजली दोनों मिल जाएगी। इसके लिए योजना की जरूरत है, लेकिन लालच के कारण इस पर पर्दा डाल दिया गया है। इसमें लालच केवल भूपेश सरकार का ही नहीं बल्कि राजस्थान सरकार के साथ-साथ खनन ठेकेदार का भी जुड़ा हुआ है।
सोलर पैनल से बनाई जा सकती है बिजली-
वीरेंद्र पांडेय ने कहा कि खदान शुरू करने से पहले यहां के सैकड़ों ग्रामीणों को दूसरे स्थानों पर विस्थापन करना पड़ेगा, इसके लिए चार गुना मुआवजा भी देना पड़ेगा। खदान चलाने में खर्च होगा। इसके बाद कोल परिवहन व खदान से प्रदूषण फैलेगा। इन सारी प्रक्रियाओं में जितने खर्च आएंगे उससे कम खर्च में नवीनीकरण करके ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। जितनी बिजली इस कोयले से बनेगी, उससे ज्यादा सोलर पैनल लगाकर बिजली आपूर्ति की जा सकती है। इधर केंद्र और राज्य सरकार के अनुमति मिलने के बाद परसा कोल ब्लॉक क्षेत्र के साल्ही, हरिहरपुर, जनार्दनपुर, फतेहपुर में परसा कोल ब्लॉक के लिए लगभग लाखों पेड़ की कटाई होनी है, जिसकी शुरुआत हो चुकी थी, वन विभाग ने 300 से अधिक पेड़ों को काट दिया था। ग्रामीणों के विरोध के बाद वन विभाग ने कटाई बंद किया है। जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए ग्रामीण पिछले 80 दिनों से धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसकी गूंज प्रदेश की राजधानी रायपुर से दिल्ली तक पहुंच गई है।
इन्होंने दिया समर्थन-
आदिवासी ग्रामीणों के इस आंदोलन को छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के सोहन पोटाई ने भी अपना समर्थन दे दिया है। साथ ही छत्तीसगढ़ क्रांति सेना के अमित बघेल ने भी ग्रामीणों के इस आंदोलन में शामिल होकर अपना समर्थन दिया। छत्तीसगढ़ प्रदेश के साथ-साथ अन्य प्रदेश से भी आदिवासी संगठन के लोग साल्ही पहुंच आंदोलन में शामिल हुए। इस दौरान आदिवासियों की संपदा को बचाने के लिए राज्य और केंद्र सरकार पर जमकर हल्ला बोलते हुए जल-जंगल-जमीन को बचाने की मांग की गई है।
बयान-
कोल ब्लाक को लेकर ग्रामीणों के साथ अन्य संगठन के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, इनकी मांगों को शासन के पास भेजा जाएगा।
अनिकेत साहू
एसडीएम
हसदेव अरण्य को बचाने आंदोलनकारियों के समर्थन में एनएच-130 में उतरे पूर्व सांसद सोहन पोटाई, रेलवे ट्रैक पर बैठकर जताया आक्रोश सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले जमकर चल रहा प्रदर्शन

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