अंबिकापुर। परसा खदान को जल्द से जल्द शुरू कराने स्थानीय ग्रामीणों ने अपनी आवाज बुलंद की है। सरगुजा जिले के उदयपुर विकासखंड में परसा कोयला परियोजना के पक्ष में आस-पास के छह गांवों के निवासी बड़ी संख्या में मंगलवार को अंबिकापुर में कलेक्टोरेट के पास एकत्र हुए और जिला कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा। साथ ही राजधानी रायपुर के एक एनजीओ पर स्थानीय लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए बाहरी तत्वों के गांव में प्रवेश पर आपत्ति जताई। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से एनजीओ के गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग की है। कलेक्टर संजीव कुमार झा ने मामले की जांच कराकर कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
ग्रामीणों का कहना है कि परसा खदान शुरू होने से सिर्फ स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर ही नहीं मिलेगा बल्कि राज्य सरकार को बड़ा राजस्व और देश को किफायती दामों पर बिजली भी मिलेगी। परसा गांव के उप सरपंच शिव कुमार यादव ने परसा खदान परियोजना का समर्थन करते हुए आलोक शुक्ला नामक व्यक्ति पर बाहरी लोगों को लाकर स्थानीय ग्रामीणों को भड़काने का आरोप लगाया। उन्होंने कलेक्टर से आग्रह किया कि परसा खदान शुरू नहीं होने पर सरकार से अनुरोध करने वे राजधानी रायपुर जाएंगे। यहां के आदिवासी भाई-बहनों को रोजगार की जरुरत है। कोरोना संकट का समय था तब उनके साथ खदान की कंपनियां खड़ी थी, न कि बाहरी लोग, जो खदान और क्षेत्र के विकास का विरोध करते हैं। सब्र खो चुके इन ग्रामीणों ने मांग पूरी नहीं होने पर जिला प्रशासन को उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है। सरगुजा जिले में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) की ताप विद्युत परियोजनाओं के लिए तीन कोल ब्लॉक परसा ईस्ट केते बासेन (पीईकेबी), परसा और केते एक्सटेंशन केंद्र सरकार द्वारा कई साल पहले आवंटित किया गया था। अभी पीईकेबी में खनन का कार्य चल रहा है, लेकिन शेष दो ब्लॉकों के लिए अनुमति लेने का कार्य छत्तीसगढ़ शासन के पास अटका है। ग्रामीणों ने जिस कोल ब्लॉक के समर्थन के लिए जिला कलेक्टर को ज्ञापन दिया है, उसके जमीन का मुआवजा भूमि अधिग्रहण नीति के तहत ग्रामीणों को मिल चुका है, जबकि ब्लॉक शुरू होने पर सभी लाभार्थियों को पुनर्वास और पुनव्र्यस्थापन नीति के तहत नौकरी दिया जाना शेष है। छत्तीसगढ़ राज्य के कोयला खदानों से देश के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान राज्य के कई बिजली संयंत्रों में कोयले की आपूर्ति होती है, जिससे बिजली का उत्पादन संभव हो पाता है और वहां की सरकार नागरिकों को सस्ते दरों पर बिजली उपलब्ध करा पाती हैं।
रोजगार की उम्मीद पर दी जमीन, अब मुआवजा की राशि पर निर्भर –
ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2019 में परसा कोयला परियोजना के लिए इस उम्मीद में अपनी जमीन दी थी कि उन्हें जमीन की अच्छी कीमत के साथ-साथ रोजगार मिलेगा किंतु जमीन देने के बावजूद खदान शुरू नहीं हुई है, उन्हें रोजगार के अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। इस वजह से उन्हें गुजर-बसर करने के लिए जमीन के मुआवजा बतौर मिले रुपये पर निर्वाह के लिए खर्च करना पड़ रहा है। मुआवजे की राशि जो स्थानीय लोगों के भविष्य का एक मात्र सहारा है उसको खर्च करने पर वे मजबूर हैं। उन्होने बताया की इसके जिम्मेदार बाहरी लोग हैं, जो परसा परियोजना को निशाना बना रहे हैं। छत्तीसगसढ़ देश का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक है। परसा और आसपास के गांव घाटबर्रा, फत्तेपुर, जनार्दनपुर, साल्ही के लोगों ने जिला प्रशासन से एनजीओ वालों को उनके ग्राम में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का सरगुजा कलेक्टर संजीव कुमार झा से आग्रह किया है।
पड़ोसी गांव के लोग हुए समृद्ध-
साल्हि गांव की वेदमती उइके ने बताया कि पड़ोस के गांव में संचालित पीईकेबी खदान के ग्रामीण, गावों के चौतरफा विकास होने से काफी समृद्ध हो रहे हैं। पीईकेबी खदान के सभी गांवों में ग्रामीणों को नौकरी देने के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और ग्रामीण विकास से संबंधित कई योजनाएं संचालित हैं, लेकिन परसा परियोजना के लाभार्थी काम शुरू नहीं होने से इन सुविधाओं से वंचित हैं।
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